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मन्दिर अपडेट

  • श्री शिरडीधाम साईं मंदिर का प्रथम वार्षिकोस्तव शनिवार 15 फ़रवरी 2014 को एक अत्यन्त भव्य अध्यात्मिक स्वरुप में आयोजित हो रहा है. इस शुभ-अवसर पर श्री साईं सन्देश स्मारिका का बिमोचन संध्या 7:00 बजे शिरडीधाम में किया जायेगा. इस समारोह में शिरडी, महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पुजारी-सह-भजन गायक श्री प्रमोद मेधी विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे

     15 Feb 2014
  • Welcome to the Official website of Shri Shirdidham Sai Mandir, Dumka

     12 Feb 2014
message from chairman

Message from Chairman

अपने समय के अत्यन्त प्रखर, ख्यातिलब्ध, विद्वान पत्रकार श्री एच0वी0 कामथ ने लिखा है कि भारत की भूमि पर शिरडी के साईंनाथ की तरह कोई दूसरा नहीं आया और आने की सम्भावना भी नहीं है। ऐसा नहीं कि वे साईं के खास भक्त थे। ऐसा भी नहीं कि साईं पर अन्धविश्वास था। उन्होंने इस पर काफी शोध किया था। उन्होंने घटनाक्रमों को समझने की कोशिश की थी और तब इस निष्कर्श पर पहुँचे।

भक्तों को शिरडी के साईं के लिए दीवानगी रहती है। एक बार शिरडी में था। 31 दिसम्बर 2004 की रात में साईं-भजनों के सर्वश्रेश्ठ गायक मनहर उधास जी को शिरडी में सुनने का अवसर मिला। उन्होंने कहा और सटीक कहा- अन्य देवी-देवताओं के भक्त होते हैं, लेकिन साईं के तो दीवाने होते हैं। वस्तुतः साईं का रंग जिस पर चढ़ा, फिर दूसरा रंग चढ़ ही नहीं सकता है। एक बार राजीव रंजन ने कहा कि शिरडी तो साईं भक्तों के लिए मक्का-मदीना है। सही में जब हम लोग जाते हैं, तो लगता है कि स्वर्ग का सुख मिल रहा है।

शिरडी जाते-आते भाव आया कि दुमका में भी साईं-भक्ति-धारा को जीवन्त कर एक भक्ति-आन्दोलन का स्वरूप दिया जाए। मंजीत उपाध्याय और राजेष कुमार सिंह (बबलू) ने दुमका के साईं भक्तों से सम्पर्क करना शुरू किया और एक बैठक करने की योजना बनायी। लेकिन शायद तब वह सही समय आया नहीं था। साईं की पूर्ण ईच्छा नहीं हुई थी। फिर कई महीनों के बाद मन्दिर-निर्माण की बात सोची गयी। संजू, नन्दा जी, अमलेन्दु, श्रवण गुप्ता, सुमन साहा, ओमियो जी के साथ मिलकर प्रयास शुरु किया गया। किन्तु पुनः बात नहीं बनी।

जब मुझे साईं ने काल के मुँह से निकाल लिया और मैं अपने घर में अस्वस्थ पड़ा था, तो साईं ने आदेश दिया तुम्हारी एक जमीन है जो मेरी ही है। उस पर ही मन्दिर बनाने का आदेश प्राप्त हो गया। इसी बीच श्री अरूण सिंह आए और कहा कि मन्दिर बनना चाहिए। मैंने कहा, समय आएगा और साईं बनवा लेंगे। साईं ने जमीन के बारे तो कहा किन्तु मैं जमीन को समझ नहीं पाया।

तब विचार आया कि साईं भक्तों का एक संगठन बने। मैं स्वस्थ हो चुका था। रविकान्त ‘सुमन‘ ने एक अखबार में लिखा कि मेरे घर पर साईं भक्तों की बैठक होगी। अब लगा कि साईं काम आगे बढ़ाना चाह रहे हैं। 18 जनवरी, 2009 को मेरे साईं निवास में साईं भक्तों की एक बैठक हुई और बन गया ‘श्री साईं समाज, दुमका। ‘9‘ अंक बाबा को प्रिय है। पहली बैठक 18 (1+8=9) को हुई और आष्चर्यजनक रूप से 27 (2+7=9) भक्त ही उपस्थित हुए। निणर्य लिया गया कि प्रत्येक महीने के दूसरे रविवार को किसी साईं भक्त के घर साईं पूजन-आरती हो। बस, अपने षहर में षुरू हो गया साईं भक्ति-आंदोलन।

शहर के टाटा शोरूम चैक पर एक बजरंगबली का मन्दिर वर्षों पहले बना था। वहाँ साईंबाबा और लोकनाथ बाबा की प्रतिमाएं स्थापित है। एक दिन डा नयन कुमार राय और मुन्ना जी मेरे पास आए। उक्त साईं प्रतिमा की चर्चा हुई। बाद में संजू ने प्रस्ताव रखा कि प्रत्येक गुरूवार को टाटा षोरुम के निकट स्थित मन्दिर में साईं की धूप आरती की जाए। सिलसिला षुरू हो गया।

अब साईं की अद्भुत कृपा से एक भव्य साईं-मन्दिर की योजना बनने लगी। अचानक मेरे बेटे आनन्द ने कहा कि ननकु कुरूआ की जमीन हमलोगों की नही साई की ही है, उस जमीन को साई-चरणों में समर्पित कर दिया जाए। तद्नुकूल समर्पित कर दिया गया। वस्तुतः मूल रूप में खैरा परिवार से मेरे भाई अनिल कुमार झा ने जमीन ली थी। उस समय तो मैं नाराज था कि शहर से 4 किलोमीटर दूर अनिल क्यों बसने जा रहा है। अब समझ में आयी कि उस जमीन पर साईं युग-युग से सूक्ष्म में निवास कर रहे हैं और वहीं वे मन्दिर बनवाना चाहते हैं। इसी क्रम में वह क्षण भी आया जब साईंनाथ की भव्य मन्दिर के लिए गुरूवार, 02 जुलाई, 2009 को भूमि पूजन का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। डा नयन जी ने भूमि पूजन किया और पुरोहित थे पं राम बाबू। खैरा परिवार से सीधे श्री साईं समाज, दुमका को जमीन प्राप्त होने का दानपत्र बनवाया गया। काम षुरू तो हुआ लेकिन साईं ने कुछ महीनों के लिए काम रूकवा दिया। मेरे अनन्य और साईं भक्त राजीव रंजन ने प्रस्ताव दिया कि पहले बोरिंग कराया जाए। उन्हीं के प्रयास से विनोद कुमार लाल ने बोरिंग करवा दिया। संजू ने नारियल फोड़ा और काम शुरू हुआ तो कभी रूका ही नहीं। बाबा की महिमा बाबा ही जानें। साईं ने प्रेरित कर आदेश दिया कि मन्दिर निर्माण स्थल का नाम ‘शिरडीधाम‘ रखा जाए। प्रत्येक महीने के आखिरी रविवार को निर्माण स्थल पर पूजन, भंडारा, आरती का कार्यक्रम होने लगा। खिचड़ी का भोग प्रसाद बन चुका था। यह शायद पहला उदाहरण होगा कि मन्दिर पूरी तरह से बना नहीं था लेकिन यहां पूजा शुरू हो गयी थी।

मन्दिर निर्माण के क्रम में समस्याएँ तो आती गयीं। कभी-कभी मैं निराश हो जाता तो साईं तुरन्त उत्साहित कर देते थे। एकाउंट खोलने में बैंक ने तो पूरा सहयोग किया। किन्तु हमलोगों की वजह से परेषानी हुई। खैर, उत्तम कुमार गुड्डु के सराहनीय प्रयास से अन्ततः एकाउंट खुला। फिर तो संजू के साथ मिलकर मैंने काम शुरू किया और ट्रस्ट-गठन तक एकाउंट से कारबार होता रहा। श्री शिरडीधाम साईं मन्दिर के लिए जो प्रोजेक्ट बना वह विशाल था और काफी पैसों की जरूरत हुई। लेकिन जब साईं ने स्वयं मन्दिर को भव्य बनाने का निर्देश दिया तो काम चलता रहा। सेवानिवृत्त इंजीनियर विष्वनाथ शील जी का सहयोग उल्लेखनीय रहा। उनके पर्यवेक्षण में पूरा मन्दिर बना। इसी क्रम में मनोज कुमार जायसवाल (मन्टू) को कोई साई भक्त कभी भूल नहीं सकता। जाड़ा, गर्मी, दिन, रात, या बरसात हो मन्टू हाजिर रहे। मन्टू का मेहनत रंग लाया।

जब निचले तल्ले के छत की ढ़लाई की बात सामने आयी, तो सोचने लगा। साईं ने अशोक सिंह के पास भेज दिया। उनके दरवाजे पर पहुँचा, तो उन्होंने भाव-विहृल होकर कहा - “सर, आप क्यों चिन्तित होते हैं, बाबा तो ऊपर बैठेंगे न! कोई नही भी देगा, तो मैं मन्दिर बनवा दूँगा। आप अपने लोगों के पास जाइए, सब काम हो जाएगा। “अशोक की प्रेरणादायी शब्द गूँजने लगे। उसके बाद जहाँ गया, लोगों ने भरपूर मदद की। मनोज देव, वकील यादव, मनोज सिंह, लवकान्त झा सबों ने बाबा के प्रति अपना फर्ज अदा किया। अशोक ने तो किया ही। जब भी वे मन्दिर के सामने से गजरते, आकर मुझे ढ़ाढस बँधाते ही थे। एक बार फिर कठिन समय आया, काम रूक जाता। लेकिन एक भक्त ने बैंक से कर्ज लेकर दिया और अभी तक वे कर्ज चुका रहे हैं। अन्तिम बड़े गुम्बद में काम रूकने की स्थिति आयी, लेकिन फिर राजीव ने मनोज देव जी को प्रेरित कर काम रूकने नहीं दिया। डा अरविन्द कुमार ने लगातार अविस्मरणीय सहयोग दिया। इंजीनियर के0 के0 सिंह जी के सभी साईं भक्त शुक्रगुजार हैं। पवन केशरी आए और पूरे मन्दिर का रंग-रोगन करवा दिया। इस भव्य साईं मन्दिर की कहानी परम साईं भक्त सुशील कुमार झा की चर्चा के बिना पूरी नहीं हो सकती है। मैं फोन करता था, वे भेजते थे, भेजते ही रहे। आज भी मन्दिर के लिए नियमित योगदान कर वे साईं की परम कृपा प्राप्त करते हैं। शिरडी के ‘लेडीबाग‘ की तरह इन्होंने शिरडीधाम के समीप अपने साई-आश्रम में भव्य फूल और फलों का बागान बनवाया है। यह आश्रम भी एक प्रेरणाश्रोत है। आबू धाबी से श्री गजेन्द्र चैधरी ने भरपूर सहयोग दिया और आज भी दे रहे हैं। षिरडी के नवनाथ जी का उल्लेख कर हमे साईं की कृपा मिलती है। शिरडी जो साईं की लीला भूमि है, वहाँ से शिरडीधाम दुमका वे लगातार अपनी दक्षिणा भेजते हैं। इसी से षिरडीधाम की महत्ता स्पश्ट होती है। डा रमेश वर्मा ने लगातार सहयोग दिया और दे रहे हैं। श्री बिनोद कुमार लाल तो पूरी तरह मन्दिर में पूर्ण समर्पित भाव से जुड़कर सभी कार्यों में लगातार अपनी सेवा देते हैं।

राजनेताओं में मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन की चर्चा सभी साईं भक्तों जी जुबान पर रहती है। इन्होंने साईनाथ की भव्य जीवन्त मूत्र्ति स्थापित करवाकर अमूल्य योगदान दिया है। झारखण्ड के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने भी कई अवसरों पर भरपूर सहयोग कर साईं भक्तों को अनुगृहीत किया।

मीडिया की चर्चा के बिना तो कहानी अधूरी ही रहेगी। दुमका के साई भक्तों के विषाल वर्ग को, साईं - भक्ति आन्दोलन को सही परिप्रेक्ष्य में मीडिया ने जगह दी। इस क्रम में सुमन कुमार सिंह, आर के नीरद, राजीव रंजन, आनन्द जायसवाल, महेश पंडित, पवन घोष, रविकान्त सुमन, उज्जवल कुमार दास, अशोक राउत, राजेश गुप्ता का योगदान अविस्मरीणय है। सुमन जी ने एकबार लिखा “देखते-देखते यह मन्दिर बन गया।“ ये शब्द मझे रह-रह कर भाव विहृल करते हैं। उज्जवल ने साईं-भक्ति-आन्दोलन से जुड़ी असंख्य जीवन्त तस्वीरों से साईं भक्तों का दिल जीता है। आज तक चैनेल के मैनेजिंग एडिटर सुप्रिय प्रसाद ने तो अपने सद्प्रयास से श्री शिरडीधाम साईं मन्दिर को राष्ट्रीय स्तर पर पूरी तरह चर्चित कर दिया। ट्रस्ट के सदस्य के रूप में वे अपने सुझावों से मन्दिर के लिए उल्लेखनीय योगदान कर रहे हैं। आज तक के धर्मवीर सिन्हा ने भी भरपूर सहयोग दिया है। कशिश चैनेल में नियमित रूप से श्री शिरडीधाम साईं मन्दिर की चर्चा आती रहती है। इस चैनेल के भी हम सब आभारी हैं।

अब कुछ खास भक्तों की भी कृतज्ञता ज्ञापित करनी है। सर्वश्री दयानन्द श्रीवास्तव, मधुकर सहाय, अनूप सिन्हा (मन्टू), अजय कुमार झा ‘मिक्की‘, प्राचार्य मणिनाथ चैधरी (भागलपुर), प्राचार्य अषोक सिंह (गोड्डा), श्रीमती अमिता रक्षित, श्रीमती सरिता सिन्हा,पूनम जी, राधेष्याम वर्मा, राजीव सिंह, दिवाकर महतो, ठाकुर, प्राचार्य अजय कुमार गुप्ता, अमर केशरी, प्रदीप पोद्दार, आनंद गुटगुटिया, सुनील खैरा, रमेश चैधरी, रामचरण चैधरी, बसन्त भालोटिया, विनोद शर्मा, अमरेन्द्र सिंह, मनोज अम्बष्ठ, सुभाष सिंह, नवीन कुमार सिंह, मनोज घोश, श्रीमती प्रतिमा अम्बष्ठ, कुमार मनोज, रामचन्द्र प्र0 सिन्हा, पिंटू अग्रवाल, रंजन कुमार सिन्हा (रंजु), सत्येन्द्र सिंह, विष्णु दारूका, आनंद मावंडिया, शिवपूजन सिंह, मानस शेखर, उमश जी (आरा), प्रमोदानन्द झा (पटना), अन्नू जी (पटना), मुकेष कुमार (मिहीजाम), सन्दीप रक्षित, गजेन्द्र कुमार, ष्यामसुंदर जी, उदित नारायण, सुनील झा (गोड्डा), सन्तोश जी (दिल्ली), डा मनोज (आसनसोल), मंटू जी (कोलकाता), महेष कुमार (आरा), प्रो0 मित्रेष्वर (घाटषिला), मनोज चैधरी (रांची), मोहन सहाय, संतोश गुप्ता, रामकुमार जायसवाल, बिपिन बिहारी प्रसाद, प्रो0 अनिल सिंह, डा0 ब्रज किषोर मिश्र, डा पी पी सिंह, अमित दे, चुन्नु जी (मुम्बई), चुन्नु (बेगूसराय), डा0 संजय लाल दास, गोपाल पंजीयारा, कृश्ण गोविन्द, बबलू राम, प्रकाष यादव, राजश मिश्र, प्रदीप मिश्र, बिमलेष, महेष, दीपू, कमलाकान्त झा (सुपौल), जटाषंकर मिश्र, महेष, मलयज वत्स, विकास मंडल, नीरज कुमार, सजल राय, छविकान्त दुबे, कुणाल किशोर, पवन झा, पिंटू सिंह, प्रेम कुमार साह, सुमित कुमार, राघवेन्द्र कुमार, कैलाष यादव, संतोश जी (शिक्षक), दिलीप कुमार झा, प्रहृलाद आनंद, सुषील कुमार झा (दिल्ली), सुभाश झा (मुंगेर), हरिषचन्द्र चैधरी इन सबों ने अपनी भक्ति, दक्षिणा से हम सबों को प्रेरित किया है।

विजय कुमार सिंह की लगातार चर्चा होती है। जब पहली बार मेरे निवास पर बैठक हुई, तो विजय समय की जानकारी सही नहीं रहने के कारण बहुत पहले आए और फिर दुबारा आए। उन्हें लगा कि साईंभक्तों की पहली बैठक हो और मैं गलती से अनुपस्थित न हो जाउँ। फिर तो वे आते ही रहे और अपने सकरात्मक सुझावों से ट्रस्ट को मार्ग-दर्षन देते रहे हैं।

श्री शिरडीधाम साईं मन्दिर, दुमका एक धाम है और एक विषिश्ट तीर्थ के रूप में दुमका की पहचान है। इस पूरे इलाके का यह एकमात्र साईं मन्दिर है जहाँ सिर्फ साईं हैं। सभी धर्मों के लोग आते हैं, पूजन-प्रार्थना करते हैं। यह एक आध्यात्मिक शान्ति-स्थल है। प्रत्येक रविवार को अपराह्न 4 बजे से और प्रत्येक गुरूवार को अपराह्न 5.30 बजे से विषेश पूजा-अर्चना होती है। साईं को महाभोग लगाया जाता है जो प्रसाद-रूप में सभी भक्त प्राप्त करते हैं। प्रतिदिन नियमित चार आरती होती है - प्रातः 6 बजे - काकड़ आरती, दिन के 12 बजे - मध्याह्न आरती, शाम 6 बजे - धूप आरती एवं रात के 9 बजे - शेज आरती। शेज आरती के बाद साईं सोते हैं, मन्दिर बन्द हो जाता है।

रविवार का भजन-गायन कार्यक्रम अति विषिश्ट है। शुरूआती दौर में गौरकान्त झा जी ने अपने भजनों से साईं-पूजन को जीवन्त किया। अभी तो दुमका के प्रसिद्ध भजन गायक श्री सत्यम के भजनों से साईं भक्त सदैव मंत्रमुग्ध रहते हैं। अखिलेष मिश्र, पं नीरज, अनुज सिंह (अन्नू), संजू भी भक्तों को झूमने पर विवष कर देते हैं। कभी-कभी तो प्रतिमा अम्बश्ठ भी अपने भजनों से वातावरण को साईंमय कर देती हैं। शिरडीधाम में शुरू से ही भंडारा का अत्यन्त विषेश महत्व रहा है। दूर-दराज के इलाके से, गांवों से, दुमका शहर से सैकड़ों भक्त आते हैं प्रसाद प्राप्त कर कृत्यक्त्य होत हैं। भक्त ही भंडारा लगवाते हैं। महाभोग बनवाने का सम्पूर्ण भार नवीन बाबू के ऊपर है। उनका सम्पूर्ण परिवार इस कार्य में संलग्न रहता है।

कहने को बहुत है, लेकिन उसे बाद के लिए सुरक्षित रखता हूँ। श्री साईंनाथ से प्रार्थना है कि मेरी सेवा सदा स्वीकार करें। साईं और समस्त साईं भक्तों के चरणों में अपने को समर्पित करता हूँ।

जय साईं! जय साईं!! जय साईं!!!

प्रो मदनेश्वर चौधरी
एक साईं - चाकर

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